Supreme Court judges vs CJI: Dipak Misra must lead the resolution news today देश के इतिहास में पहली बार सुप्रीम कोर्ट के चार सीनियर जज एक साथ मीडिया के सामने आए। साथ ही कहा कि सुप्रीम कोर्ट का एडमिनिस्ट्रेशन ठीक से काम नहीं कर रहा है और चीफ जस्टिस की ओर से ज्युडिशियल बेंचों को सुनवाई के लिए केस मनमाने ढंग से दिए जा रहे हैं। इससे ज्युडिशियरी के भरोसे पर दाग लग रहा है। उन्होंने यह भी कहा कि अगर इंस्टीट्यूशन को ठीक नहीं किया गया तो लोकतंत्र खत्म हो जाएगा

बता दें कि 20 मिनट तक चली इस कॉन्फ्रेंस में जस्टिस जे चेलमेश्वर, जस्टिस रंजन गोगोई, जस्टिस मदन भीमराव लोकुर और जस्टिस कुरियन जोसफ मौजूद थे। लेकिन, दो जजों ने ही मीडिया के सामने बात रखी। कोर्ट के सूत्रों के मुताबिक, जजों की प्रेस कॉन्फ्रेंस के बाद CJI ने अटॉर्नी जनरल केके वेणुगोपाल को मीटिंग के लिए बुलाया। उधर, सरकार ने कहा है कि वह इस मामले में दखल नहीं देगी।

4 जजों ने मीडिया के सामने क्या कहा?

1) लेटर में लिखा- CJI सभी बराबर के साथियों में प्रथम, ऊपर या नीचे नहीं
- चारों जजों ने CJI को 7 पेज का एक लेटर भेजा है। यह लेटर उन्होंने मीडिया को भी सौंपा। इसमें लिखा है, "ये निश्चित और तय सिद्धांत है कि CJI ही रोस्टर का मालिक होता है, जिसके पास ये अधिकार होता है कि वो ये तय करे कि किन मामलों में कौन से जज या बेंच में सुनवाई की जानी चाहिए। CJI को ये रोस्टर तय करने की परंपरा इसलिए है ताकि कोर्ट का काम अनुशासित और प्रभावी ढंग से होता रहे। लेकिन, इससे ये नहीं माना जाना चाहिए कि चीफ जस्टिस का ओहदा साथियों से ऊपर है। इस देश की न्याय व्यवस्था में ये अच्छी तरह स्थापित है कि CJI सभी बराबर के साथियों में प्रथम हैं, ना उनसे ऊपर और ना ही उनसे नीचे।"
- भास्कर ने इस बारे में पहले ही विजुअलाइज कर लिखा था। पढ़ें ग्रुप एडिटर कल्पेश याग्निक का 18 नवंबर 2017 को पब्लिश हुआ कॉलम।

2) CJI ने अपनी पसंद से सौंपे केस
- लेटर में यह भी लिखा है कि ऐसे कई उदाहरण हैं जिनके देश और ज्युडिशियरी पर दूरगामी असर हुए हैं। चीफ जस्टिसेज ने कई केसों को बिना किसी तार्किक आधार के 'अपनी पसंद' के हिसाब से बेंचों को सौंपा है। ऐसी बातों को हर कीमत पर रोका जाना चाहिए। उन्होंने यह भी लिखा कि ज्युडिशियरी के सामने असहज स्थिति पैदा ना हो, इसलिए वे अभी इसका डिटेल नहीं दे रहे हैं, लेकिन इसे समझा जाना चाहिए कि ऐसे मनमाने ढंग से काम करने से इंस्टीट्यूशन (सुप्रीम कोर्ट) की इमेज कुछ हद तक धूमिल हुई है। (पूरी खबर पढ़ने के लिए यहां क्लिक करें)

3) 'कोई ये न कहे कि हमने आत्मा बेच दी'
- प्रेस कॉन्फ्रेंस के दौरान जस्टिस जे चेलमेश्वर ने कहा कि हम चारों मीडिया का शुक्रिया अदा करना चाहते हैं। किसी भी देश के कानून के इतिहास में यह बहुत बड़ा दिन है, ऐसा पहले कभी नहीं हुआ, क्योंकि हमें यह प्रेस कॉन्फ्रेंस करने के लिए मजबूर होना पड़ा है। प्रेस कॉन्फ्रेंस इसलिए की, ताकि कोई ये न कहे कि हमने अपनी आत्मा बेच दी है।
- उन्होंने कहा कि बीते कुछ महीनों में सुप्रीम कोर्ट में बहुत कुछ ऐसा हुआ, जो नहीं होना चाहिए था। हम आपसे इसलिए बात कर रहे हैं, क्योंकि हम देश के प्रति अपनी जिम्मेदारी से नहीं भागना चाहते। हमने CJI को एहतियाती कदम उठाने और मनाने की कोशिश की। उन्हें लेटर भी लिखा, लेकिन नाकाम रहे।

4) 'आपके शब्द हमारे मुंह में न डालें'
- जस्टिस चेलमेश्वर से पूछा गया कि क्या वे CJI के खिलाफ महाभियोग लाना चाहते हैं? इस पर उन्होंने कहा, "आप अपने शब्द हमारे मुंह में मत डालिए।"


मोदी ने कानून मंत्री को मीटिंग के लिए बुलाया
- मीडिया रिपोर्ट्स के मुताबिक, चार जजों की प्रेस कॉन्फ्रेंस के बाद नरेंद्र मोदी ने फौरन केंद्रीय कानून मंत्री रविशंकर प्रसाद को मीटिंग के लिए बुलाया।

- बीजेपी नेता संबित पात्रा ने कहा, "ये सुप्रीम कोर्ट के भीतर का मामला है और अटॉर्नी जनरल ने इस पर स्टेटमेंट दिया है। इस पर राजनीति नहीं की जानी चाहिए। मैं आश्चर्यचकित हूं और दुखी भी कि जिस कांग्रेस को लोगों ने कई बार रिजेक्ट किया है, वो इसका राजनीतिक फायदा उठाने की कोशिश कर रही है। इससे वो खुद ही बेनकाब हो रही है।"

कौन हैं ये जज
1) जस्टिस जे चेलमेश्वर
- सुप्रीम कोर्ट के दूसरे नंबर के सबसे सीनियर जज हैं। आंध्र प्रदेश हाईकोर्ट के एडीशनल जज और 2007 में गुवाहाटी हाईकोर्ट के चीफ जस्टिस बने। उन्हें केरल हाईकोर्ट का चीफ जस्टिस बनाया गया। अक्टूबर 2011 में वे सुप्रीम कोर्ट के जज बने।

इसलिए रहे चर्चा में
- जस्टिस चेलमेश्वर ने पिछले साल मई में सुप्रीम कोर्ट में वाई-फाई फैसेलिटी न होने को लेकर सवाल उठाया था। जे चेलमेश्वर और फॉली नरीमन की दो जजों की बेंच ने ही इस कानून को रद्द किया था, जिसके तहत पुलिस को किसी भी ऐसे शख्स को अरेस्ट करने का ऑर्डर था, जिसने किसी को कुछ मेल किया हो या कोई इलेक्ट्रॉनिक मैसेज दिया हो, जिससे किसी को कुछ परेशानी हुई हो।
- वे आधार से जुड़े प्राइवेसी के मामले की सुनवाई करने वाली बेंच में भी जज थे।

2) जस्टिस रंजन गोगोई
जस्टिस रंजन गोगोई ने 2012 में सुप्रीम कोर्ट के जज के रूप में शपथ ली। इससे पहले वे पंजाब-हरियाणा हाईकोर्ट के चीफ जस्टिस थे। वे गुवाहाटी हाईकोर्ट में भी अपनी सेवा दे चुके हैं।
इसलिए रहे चर्चा में
- कोलकाता हाईकोर्ट के जस्टिस सीएस कर्णन को सजा सुनाने वाली सात जजों की बेंच में वे जज थे।
- सरकारी विज्ञापनों में राज्यपाल, केंद्रीय मंत्रियों, मुख्यमंत्रियों और राज्य मंत्रियों की फोटो के इस्तेमाल की इजाजत दी थी। सुप्रीम कोर्ट का पिछला फैसला पलट दिया था।

3) जस्टिस मदन लोकुर
जस्टिस मदन भीमराव लोकुर ने 1977 में बतौर लॉयर करियर की शुरुआत की। उन्होंने सुप्रीम कोर्ट और दिल्ली हाईकोर्ट में वकालत की। वे फरवरी 2010 से मई तक दिल्ली हाईकोर्ट में एक्टिंग चीफ जस्टिस रहे। जून में वे गुवाहाटी हाईकोर्ट और बाद में आंध्र प्रदेश हाईकोर्ट के चीफ जस्टिस बने।
इसलिए रहे चर्चा में
- बिहार के एक मामले में बगैर तलाक लिए कानूनी तौर पर पति से अलग रह रही पत्नी को गुजारा भत्ता देने का फैसला दिया था।
- ओपन जेल के कंसेप्ट पर गृह मंत्रालय को बैठक करने का निर्देश दिया था। कोर्ट का कहना था कि अगर ऐसा होता है तो जेल में ज्यादा कैदियों की परेशानी से निजात मिलेगी।

4) जस्टिस कुरियन जोसफ
- जस्टिस कुरियन ने कानून के क्षेत्र में अपना करियर 1979 से शुरू किया। 2000 में उन्हें केरल हाईकोर्ट को जज बनाया गया। 2010 में वे हिमाचल प्रदेश हाईकोर्ट के चीफ जस्टिस बने। 8 मार्च 2013 को सुप्रीम कोर्ट के जज बने।

इसलिए रहे चर्चा में
- तीन तलाक को गैर-कानूनी करना का ऑर्डर देने वाली पांच जजों की बेंच में शामिल थे।
- गुड फ्राइडे पर कॉन्फ्रेंस बुलाने का विरोध किया था। उन्होंने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को लेटर लिखा था। इसमें उन्होंने कि वो गुड फ्राइडे की वजह से परिवार के साथ केरल में हैं और इस मौके पर होने वाले डिनर में नहीं आ पाएंगे। उन्होंने यह भी लिखा है कि दिवाली, दशहरा, होली, ईद, बकरीद जैसे शुभ और पवित्र दिन ऐसा कोई आयोजन नहीं होता।

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