ट्रेफिक सिग्नल पर बचपन खिलौने बेचता मिलता है. एक नन्हा सा बच्चा चाभी वाले गुड्डे को चला चला कर कार में बैठे बच्चों और बड़ों को लुभाने की कोशिस कर रहा था. वो गुड्डा जो गोल गोल घूमकर किसी भी बच्चे की किलकारियां, मुस्कुराहटें और तालियाँ हासिल करने की काबिलियत रखता था उसे एक और बच्चा अपनी रोटी जुटाने के लिए घुमा रहा था. 

खिलौने हर बच्चे को नहीं लुभा सकते. गुब्बारे वाली दिखाई दी जिसकी गोद में छह सात महीने का शिशु था. वह बच्चा बार बार गुब्बारों पर झपट रहा था. केवल झपट ही सकता था रंग बिरंगे वो गुब्बारे उसको नहीं मिल सकते थे. एक ग्राम से भी कम वजन का गुब्बारा भीतर भरी हवा की ताकत से फूलकर मुस्कराहट जगाने वाले सबसे बड़े जादू में तब्दील हो जाता है.

वेणियाँ बेचती बच्ची के अपने केश खुले मिले. रूखे बालों को बांधने की उसे सुध नहीं. मोगरे की कलियों को धागों में पिरोते हुए उसे क्या केवल दूसरों के केश याद रहते होंगे?? दिल नहीं चाहता होगा की एक वेणी बाँध, खुद भी आईना देख ले.

कोई भी दिन या उत्सव हो यह दूसरों के लिए खुशियों का सामान बेचते हे. इनके पास केवल पेट हे. खिलोने बेचना खेल हे. किसने दूसरों की मुस्कुराहट को इनके जीने की उम्मीद बना दिया??

पेट और पैसे का खेल देखने वालो के लिए किसने जिंदगी को खिलौना बना दिया?? चोराहों पर खड़े यह सवाल वहीँ रह जाते हे, और राही रास्तों पर आगे बढ़ जाते हे. इनके लिए रास्ता बनाने का जिम्मा किसी का नहीं?? हम जो कभी मुस्कुराहटें खरीद भी लेते हे, क्या हमारा भी नहीं??

कही सारे सवाल मन में आते हे लेकिन जवाब एक भी नहीं मिलता. कैसे इनका बचपन, जवानी और बुढ़ापा सडको पर दूसरों को खुशियाँ देने में गुजर जाता हे. क्या कोई ऐसा नहीं जो इन्हें खुशियाँ दे सके. आईये मिलकर इनके लिए कुछ करे, इनकी मदद करे और इनके चेहरे पे वही खुशियाँ लाये जो यह अपना सामान बेचकर हमारे चेहरे पे लाने की कोशिस करते हे.

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