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दिसंबर का महीना था और रात के 12:00 बज रहे थे. ट्रेन 10 घंटे लेट थी. स्टेशन पर ठिठुरते हुए समय काटना मुश्किल हो रहा था. पेट में भूख के कारण दर्द भी होने लगा था. विन्ध्याचल के उस छोटे से स्टेशन पर एक चाय की दुकान के अलावा कुछ भी नहीं था. और ठंड अधिक होने के कारण वो भी बंद हो चुकी थी. गार्ड ने बताया की यहां बहुत कम गाड़ियां रूकती है. वहां गार्ड के अलावा कुछ 3-4 यात्री ही थे. पहली बार इतनी घबराहट हो रही थी. चोकीदार हमारी घबराहट भाप चूका था. उस समय तो हमारे पसीने छूट गए जब उसने फोन पर बात करते हुए बोला जरा जल्दी आना. हमें एहसास हुआ कि वह अपने साथियों को बुला रहा है. कुछ दिनों पहले दिल्ली में सामूहिक बालात्कार हुआ था. इसने हमें और भी ज्यादा डरा दिया और मे और मेरी सहेली बचाव के नए-नए तरीके सोचने लगे. तभी कंबल ओढ़े एक नौजवान आता दिखाई दिया. मेरी सहेली ने अपने पर्स में से चाकू निकाल लिया और मैंने भी झट से मिर्ची का स्प्रे निकाल लिया. जैसे ही वह कंबल में से हाथ निकालने लगा मैं उसकी आंखों में मिर्च डालने को तैयार हो गई, परंतु तभी उसके हाथ में चाय की केतली, गिलास और साथ में बिस्कुट देख कर हमारे हाथ वही रुक गए. आश्चर्य से हमारी आंखें फटी की फटी रह गई. बिना कुछ कहे मैं और मेरी सहेली एक दूसरे की ओर देखने लगे. अब उस गार्ड को धन्यवाद कहने के लिए भी हमारे पास शब्द नहीं थे.

कई बार जिंदगी में ऐसा होता हे की हमें किसी इंसान पर शक होने लगता हे, हम उसे गलत तरीके से देखते हे और उसे गलत समझते हे. लेकिन वाही हमारे लिए फ़रिश्ता बन के आता हे. सच में किसी ने सही ही कहा हे की किसी के चेहरे पर नहीं लिखा होता हे की वो कैसा इंसान हे. इस से एक बात तो पता चलती हे की दुनिया में भलाई और ईमानदारी आज भी जिंदा हे.

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