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तीन तलाक मां-बेटी की जिंदगी खराब कर दी खून से लिखा खत divorce 3 times in islam rules of talaq

how talaq happens in islam - पति द्वारा दिए तीन तलाक का विरोध करते हुए जिले की एक मुस्लिम महिला ने सुप्रीम कोर्ट के चीफ जस्टिस (सीजेआई) को अपने खून से खत लिखकर इंसाफ मांगा है। महिला ने तीन तलाक कानून को बंद कराने की वकालत की है। महिला ने खत में कहा, कानून ऐसा हो जो सब के लिए समान हो। मैं ऐसे किसी तीन तलाक कानून को नहीं मानती जिससे मेरी और मेरी चार साल की बच्ची का भविष्य खराब हो गया। यदि मुझे इंसाफ नहीं मिला तो जान देने की अनुमति दे दी जाए। महिला द्वारा पिछले सप्ताह पति के खिलाफ प्रताड़ना का केस भी दर्ज कराया गया है।
islamic divorce women's rights grounds for divorce in islam - महिला ने कहा मैं नर्सिंग कोर्स कर चुकी थी और नौकरी करना चाहती थी। पर वह खेत पर काम कराना चाहता था। मना करने पर मारपीट करता था। मैं परिवार के साथ रहना चाहती थी पर ऐसा नहीं होने दिया। दहेज के लिए भी प्रताड़ित किया और दूसरी शादी कर ली इसलिए पुलिस रिपोर्ट करानी पड़ी। इधर, महिला के पति टीपू शाह ने फोन पर बताया कि पत्नी शबाना घर में ठीक से नहीं रहती थी। एक बार समझौता होने पर मैं खुद लेने गया लेकिन नहीं आई और परिवार वालों ने अभद्रता की। शबाना हमेशा नौकरी कराने की बात करती थी पर यह तो फैमिली ही तय करेगी कि महिला को बाहर नौकरी कराना है या नहीं। तलाक की कार्रवाई विधिवत की है और मुस्लिम रीति अनुसार तीन नोटिस गए पर वह एक बार भी जवाब देने नहीं आई। आरोप झूठे हैं। शबाना शाह अपनी बच्ची के साथ

तीन बार तलाक कहकर छोड़ दिया मुझे और मेरी बच्ची को rules of talaq islam quran one talaq in islam when talaq is not valid in islam types of talaq in islam 
मेरी शादी मुस्लिम रीति-रिवाज के अनुसार 25 मई 2011 को टीपू शाह से महूखेड़ा हाटपिपल्या में हुई थी। एक चार साल की लड़की है, जिसका नाम तहजीब है। पति टीपू ने तीन बार तलाक-तलाक कहकर तलाक दे दिया और मुझे और बच्ची को छोड़ दिया। कहा कि तुम मुझे पसंद नहीं हो और उसके बाद 19 नवंबर 2016 को दूसरी शादी कर ली। मैं तीन तलाक के सख्त खिलाफ हूं, अब मुझे देश का जो कानून है, सबके लिए समान है, इसके तहत न्याय मिले। ऐसे पर्सनल लॉ को मैं नहीं मानती जिससे मेरी और मेरी बच्ची का भविष्य खराब हो गया। मुझे देश के कानून पर पूरा विश्वास है कि मुझे और मेरी जैसी कई बहन-बेटियों को न्याय मिले। यह मेरी लड़ाई और मेरी बच्ची और ऐसे कई बच्चे की है जिन्हें इस तरह से छोड़ दिया जाता है। इस तरह बेटी होने की सजा जो मुझे दी है, ऐसी जिंदगी से हताश हो चुकी हूं। मैं अपने मां-बाप पर बोझ नहीं बनना चाहती। ऐसी जिंदगी नहीं जीना चाहती, जहां मौत से बदतर जिंदगी हो। मौत एक बार आती है और ऐसी मौत मैं रोज मरती हूं। ऐसे तीन तलाक कानून को रद्द किया जाए और मुझे न्याय दिलाया जाए या मुझे और मेरी बच्ची को आत्महत्या की इजाजत दी जाए। (यह पत्र मैं अपने खून से लिख रही हूं)' -शबाना शाह, दत्तोतर, जिला-देवास तीन तलाक सुप्रीम कोर्ट इस्लाम में तलाक मुस्लिम तलाक कानून तीन तलाक़ क्या है ट्रिपल तलाक हलाला प्रथा हलाला क्या है तीन तलाक़ इन इस्लाम

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