आज राखी का दिन हे. सुबह से शाम हो गयी, लेकिन में और तुम छत पर जाने का वक्त ही नहीं निकाल पाएं. हमारी छत से लगा हुआ आम का पेड़ हे. अक्सर वंहा आम के पत्ते गिरते रहते हे. गर्मियों में छत पर सोते हुए इस पेड़ की हवा में, शाम को एक साथ चाय पिते हुए कितनी ही बातें की हे मेने और दीदी तुमने. पर आज सिर्फ आप एक दीदी ही नहीं मेरे दो साल के भांजे की माँ भी हो. 

अभी तुम घर के काम निपटा रही हो और में अकेला ही खड़ा पेड़ को देख रहा हु. हमारे कितने ही झगड़े इस पेड़ की डालियों ने, तो कभी इसकी ठंडी हवा ने सुलझाये हे. टकटकी लगाए हुए पेड़ को देखता हु तो ऐसा लगता हे जैसे कल की ही बात हो. एक दिन स्कूल का कहकर पिकनिक मानाने गया था तब तुमने मुझे पापा की डांट से बचाया था. एक बार रात को छुप-छुप कर फैशन टीवी देखते हुए भी तुमने मुझे पकड़ लिया था. उसके अगले दिन में तुमसे नजर ही नहीं मिला पा रहा था, फिर भी तुमने मम्मी से मेरी शिकायत नहीं की और मुझसे सीधी बात भी की और मुझे संभाला भी था.

एक बार की बात हे में तुम्हे कोचिंग लेने नहीं पहुँच पाया था और तुम किसी लड़के के साथ घर आई थी. उस बात पर मेने कितना गुस्सा किया था और मम्मी पापा को भी बता दिया था. मुझे याद हे की तुम उस दिन कितना रोई थी. मुझे आज भी सब याद हे. कभी कभी अपने साथ मेरा टिफिन भी बनाना, कपडे धोना. जिस दिन तुम्हारी शादी हुयी उस दिन फफक-फफक कर रोया था में. यह अलग बात हे की जिंदगी आज भी उसी रफ्तार से चल रही हे. बस कमी हे तो उस दोस्त की जिसकी आड़ में, में अपनी कमी छुपा सकूँ, जरुरत पड़ने पर पैसे उधार ले सकूं, पापा को किसी भी बात के लिए मना सकूं. दीदी आज आप मेरे सामने नहीं हो आपकी कमी बहुत खलती हे.

आज फिर हम दोनों पेड़ के निचे खड़े हे और तुम कह रही हो की कितने बड़े हो गए हो तुम और में कह रहा हु कितनी सयानी हो गयी हो तुम. आज लगता हे की जिंदगी का वो समय कितना सुखद था जो हमने लड़ते-झगड़ते गुजार दिया. पता ही नहीं चला की कब तुम इस घर से अनजाने लोगों के बीच चली गयी. आज लगता हे जो पल हे यही पल हे, बस इसी को जियो.

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