बेटियाँ तो माँ-बाप की परियां होती हे ! उनके दिल का सम्मान, उनकी आन-बान और शान होती हे ! फिर भी लोग कहते हे की बेटियाँ पराया धन होती हे ! बेटियाँ वो कली हे जो पुरे आंगन को महकाती हे! कहते हे ना की छोटी हो या बड़ी पर एक बेटी होनी चाहिए ! छोटी हो तो भाई का हाथ पकड़ने वाली और बड़ी हो तो भाई को बचाने वाली ! लेकिन आजकल लोग बेटियों को गर्भ में ही मार देते हे ! कन्या-भूर्ण हत्या कर देते हे ! क्योकि उन्हें बेटा चाहिए होता हे ! लेकिन वो भूल जाते हे की वो एक खुद एक बेटी हे ! बेटे साथ छोड़ सकते हे लेकिन बेटियाँ कभी नहीं ! आज की इस पोस्ट में, में आपको इस से जुडी एक कविता बता रहा हु उम्मीद करता हु की आपको पसंद आएगी ! 


कविता

माँ मुझे माफ़ करना में बेटी ना जन सकी,

में गुनहगार हु तुझे भी ना समज सकी !

तूने मुझे जन्म दिया,

लेकिन मेने अपने ही भ्रूण को गिरवा दिया !

मेने अपनों को ही कोसा और सिसकी,

खुद को कमजोर माना और कुछ ना कर सकी !

अब मुझे मेरा ही अंश, अपने सपनो में धिक्कारता हें ,

बेटा-बेटी में अंतर क्यों ?? पूछता हे !

यदि बेटा हे अपना तो बेटी पराई क्यों??

अपने ही अंश को गिरवाकर अब में पछताती हु,

बेटे की चाह में अब खुद को दोषी पाती हु !

माँ, तुझे याद होगा बापू की मोत पर दाह मुझसे कराया था,

तब तूने ही समाज को बेटा-बेटी का अंतर समझाया था !

मेने उसी समय तुझे अपना आदर्श बनाया था,

मेने ही खेत-खलिहान और व्यवसाय संभाला था !

मेरी शादी में तूने अकेले ही कन्यादान कराया था,

तूने ही तब मुझे बेटा-बेटी का सबक सिखाया था !

तुमने मुझे हमेशा अपना बेटा ही समझा था,

इसलिए तुम्हारे ना रहने पर मेने बेटे का फर्ज़ निभाया था !

मुझे मलाल हे की में अपना वचन ना निभा सकी,

में क्यों ना तुम्हारी तरह माँ बन सकी !

हां में गुनहगार हु, अपने ही कन्या अंश की रक्षा ना कर सकी,

माँ मुझे माफ़ करना, में बेटी धर्म ना निभा सकी !!



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