एंटीडिप्रेशन दवाओं से लोगों का नहीं बल्कि फार्म कम्पनियों का डिप्रेशन दूर होता हे, क्योंकि उनके बैंक खातों में रूपये की बाढ़ आ जाती हे. डॉक्टर खुश होते हे, क्योंकि उन्हें एक परमानेंट ग्राहक मिल जाता हे, लगभग उम्र भर के लिए. मार्केटिंग स्टाफ खुश हे, क्योंकि उनके टारगेट्स पुरे हो रहे हे. लेकिन इन सबके बीच में अगर कोई पीस रहा हे तो वह हे पेशेंट.
आप एंटीडिप्रेशन दवाओं का विज्ञापन देखते हे की एक इंसान उदास बैठा हे और दवाई खाने के बाद वह उछलने-कूदने लगता हे. लेकिन सच ऐसा नहीं हे. अभी अमेरिका में 700 लोगों पर एक रिसर्च की गई जिससे यह पता चला की एंटीडिप्रेशन दवाओं का असर गंभीर प्रकार के डिप्रेशन में ही फायदेमंद होता हे या यह कहे की यह ऐसे रोगियों के लिए जीवन रक्षक होती हे जिन्हें बचाना जरुरी होता हे. दवाई निर्माता केवल गंभीर रोगियों के उदहारण दिखाकर डॉक्टरों को दवाई लिखने के लिए प्रेरित करते हे तथा रोगियों को डराकर की आप भी गंभीर अवस्था में पहुँच सकते हे और आपका जीवन तबाह हो सकता हे, यह सब मिलकर एंटीडिप्रेशन दवाओं की बिक्री बढ़ा रहे हे. 

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चिंता, कब्ज होना या दस्त लगना, थकान या अनिद्रा, सिरदर्द, उदासी, बचैनी, वजन बढ़ना, सेक्स में असक्षमता, जी मचलना, दवाओं की आदत हो जाना. इतने सारे साइड इफेक्ट्स पढ़कर आप सोच रहे होंगे की रोगी क्या करें? विश्व में हर साल करोड़ो की तादाद में एंटीडिप्रेशन दवाइयां डॉक्टर लिख रहे हे, वो भी बे-हिचक, बे-लगाम. लेकिन वे डॉक्टर यह क्यों नहीं समझते की उदासी की वजह क्या हे, पहले उसका तो पता लगाये. लक्षण देखते ही दवाई लिखना शुरू ना करे. अपने रोगी के डिप्रेशन की वजह तो समझें, उसके कारणों को तो जाने.

अगर रोगी आलस से पीड़ित हे तो उसे मेहनती कामों में लगायें. अगर हार्मोनल प्रॉब्लम हे तो उसे ठीक करने का उपचार दे. कहीं आपका रोगी पोषक तत्वों की कमी से तो नहीं जूझ रहा हे. यदि ऐसा हे तो उसे पोषक तत्व खाने को कहें. ऐसा करके आप उसे बिना साइड इफ़ेक्ट के अच्छा जीवन दे देंगे और यही तो आपके डॉक्टर बनने का लक्ष्य हे.

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