१]ब्रह्म स्नान : ब्रह्म – परमात्मा का चिंतन करके, “जल ब्रह्म, स्थल ब्रह्म, नहानेवाला ब्रह्म...” ऐसा चिंतन करके ब्राह्ममुहूर्त में नहाना, इसे ब्रह्म स्नान कहते हैं |

२] ऋषि स्नान : ब्राह्ममुहूर्त में आकाश में तारे दिखते हों और नहा लें, यह ऋषि स्नान है | इसे करनेवाले की बुद्धि बड़ी तेजस्वी होती है |

३] देव स्नान : देव – नदियों में नहाना या देव – नदियों का स्मरण करके सूर्योदय से पूर्व नहाना, यह देव स्नान हैं |

४] मानव स्नान : सूर्योदय के थोड़े समय पूर्व का स्नान मानव स्नान है |

५] दानव स्नान : सूर्योदय के पश्चात चाय पीकर, नाश्ता करके ८ से १२ – १ बजे के बीच नहाना, यह दानव स्नान है |

हमेशा ब्रह्म स्नान, ऋषि स्नान करने का ही प्रयास करना चाहिए |इनके अलावा अन्य ७ प्रकार के स्नानों का भी उल्लेख शास्त्रों में है | उनकी भी महत्ता बापूजी ने बतायी है :

१] मंत्र स्नान : गुरुमंत्र जपते हुए अपने को शुद्ध बना लिया |

२] भौम स्नान : शरीर को पवित्र मिट्टी स्पर्श कराके शुद्धि मान ली |

३] अग्नि स्नान : मंत्र जपते हुए सारे शरीर को भस्म लगा ली |

४] वायव्य स्नान : गाय के चरणों की धूलि लगा ली | वह भी पवित्र बना देती है | गाय के पैरों की धूलि से ललाट पर तिलक करके काम - धंधे पर जाय तो सफलता मिलती है अथवा कोई काम अटका है तो वह अटक – भटक निकल जाती है |

५] दिव्य स्नान : सूरज निकला हो और बरसात हो रही हो, उस समय सूर्य – किरणों में बरसात की बूँदों से स्नान |

६] वारुण स्नान : जल में डुबकी लगाकर नहाना इसको वारुण स्नान बोलते हैं | घर में वारुण स्नान माने पानी से स्नान करना |

७] मानसिक स्नान : ‘मैं आत्मा हूँ, चैतन्य हूँ, ॐ ॐ ॐ .... पंचभौतिक शरीर मैं नहीं हूँ | बदलनेवाले मन को मैं जानता हूँ | बुद्धि के निर्णय बदलते हैं, भाव भी बदलते हैं, ये सब बदलनेवाले हैं, उनको जाननेवाला मैं अबदल आत्मा हूँ | ॐ ॐ परमात्मने नम: ॐ ॐ ..’ इस प्रकार आत्मचिंतन करने को बोलते हैं मानसिक स्नान

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