‘मैं फौज पर पत्थर फेंक महीने के 7 हजार कमा लेता हूं.’
‘पेट्रोल बम बनाने के 700 रुपये मिलते हैं’ 
‘वीकडेज़ पर पत्थरबाजी का रेट 700 है. लेकिन जुमे के दिन पत्थरबाजी करने के 1000 तक मिल जाते हैं’
Stone pelters being paid to charge at security forces in Jammu Kashmir
‘बच्चों को पत्थर फेंकने के साढ़े पांच हज़ार तक मिलते हैं. लेकिन 12 साल से छोटे बच्चों का रेट फिक्स है, 4 हजार रुपए महीना’

‘हमें व्टाट्सएप पर पत्थर फेंकने की जगह और वक्त बताया जाता है.’

ये बयान कश्मीर घाटी के प्रोफेशनल पत्थरबाज़ों के हैं. प्रोफेशनल पत्थरबाज़. आपकी मेरी तरह पेरोल पे काम करने वाले. इंडिया टुडे के स्टिंग ऑपरेशन में वो शक पक्का हुआ है, जो लंबे समय से सुरक्षा एजेंसियों को था – कि कश्मीर में होने वाले सभी विरोध प्रदर्शन पूरी तरह स्वतः स्फूर्त (स्पॉन्टेनियस) नहीं हैं. लंबे समय से अंदाज़ा लगाया जा रहा था कि कश्मीर में जितने सिस्टमैटिक  ढंग से फौज और पुलिस की कार्रवाई के बीच पत्थर चलाए जाते हैं, उसके पीछे कहीं न कहीं गहरी प्लानिंग है. घाटी में इन्हें एक नाम भी मिला हुआ है – ‘संगबाज़.’ ‘संग’ का मतलब पत्थर होता है.

पत्थरबाज़ ज़ाकिर अहमद भट.
पत्थरबाज़ ज़ाकिर अहमद भट.
ये स्टिंग ऑपरेशन इंडिया टुडे ने किया है. इसमें बारामुला के पत्थरबाज़ ज़ाकिर अहमद भट, फारूक अहमद लोन, वसीम अहमद खान, मुश्ताक वीरी और इब्राहिम खान ने हिजबुल कमांडर बुरहान वानी के मारे जाने के बाद हुए प्रदर्शनों के कई पहलू उजागर किए. हिजबुल कमांडर बुरहान वानी के मारे जाने के बाद अचानक इन घटनाओं में उछाल आ गया. घाटी के इतिहास में सबसे लंबा कर्फ्यू लगा. लेकिन लोग सड़कों पर आए और जमकर पत्थरबाज़ी हुई. इस स्टिंग में जो कुछ सामने आया, वो हम आपके लिए ले आए हैं.

महीने की तनख्वाह और दिहाड़ी – दोनों ऑप्शन हैं

बारामुला के ज़ाकिर अहमद भट ने बताया कि सुरक्षा एजेंसियों पर पत्थर चलाने के लिए उसे हर महीने 5000 से 7000 तक मिल जाते हैं. इसके साथ कपड़े और कभी-कभार जूते भी मिल जाते हैं. भट वो पेट्रोल बम भी बनाता है, जो गली में छुपकर पुलिस की गाड़ियों पर फेंके जाते हैं. इन्हें मोलोटोव कॉकटेल कहते हैं. ऐसा एक बम बनाने के लिए भट जैसे लोगों को 700 रुपए तक मिल जाते हैं. वीरी ने कहा कि 700 रुपए दिहाड़ी पर भी पत्थरबाज़ी की जा रही है. ये वीकडेज़  का रेट है. शुक्रवार को होने वाली पत्थरबाज़ी के लिए 1000 रुपए तक मिलते हैं. शुक्रवार की नमाज़  के बाद घाटी में ज़्यादा बड़े प्रदर्शन होते हैं, जिनकी तस्वीरें हम अखबारों में देखते रहते हैं.

बच्चों का रेट फिक्स है

प्रोफेशनल पत्थरबाज़ अपने काम में बच्चों को शामिल करने से भी नहीं कतराते. इब्राहिम खान ने कहा कि अगर पत्थर चलाने वाला लड़का अच्छी सेहत वाला हुआ (जिससे वो ज़्यादा दूर तक पत्थर फेंक सके) तो उसे 7000 से 7500 तक दिए जाते हैं. थोड़ा कमज़ोर हुआ तो 5500 से 6000 तक. सबसे परेशान करने वाली बात ये सामने आई कि 12 साल से छोटे बच्चों को भी इस काम में लिया जाता है. इनके लिए 4000 रुपए महीने का रेट फिक्स है.

“मैंने अब तक 50-60 बम बनाए होंगे. हम इन्हें आर्मी, पुलिस, MLA, मंत्री या जो भी सामने आ जाए उस पर फेंक देते हैं”

– ज़ाकिर अहमद भट
पैसे के सोर्स पर चुप

ये सवाल करने पर कि पत्थरबाज़ी के लिए मिलने वाले ये पैसे आते कहां से हैं, किसी भी पत्थरबाज़ ने अपना मुंह नहीं खोला. बस इतना कहा कि वे उसे अपने दोस्तों के ज़रिए जानते हैं. वैसे सुरक्षा एजेंसियां लंबे समय से कहती रही हैं कि घाटी में पत्थरबाज़ी के लिए पाकिस्तान से पैसा आता है.

व्हाट्सऐप ग्रुप के ज़रिए कॉर्डिनेट करते हैं

पत्थरबाज़ों का अपना नेटवर्क है. वे आपस में वॉट्सऐप ग्रुप्स के ज़रिए जुड़े रहते हैं. इन्हीं के ज़रिए इन्हें ‘ऊपर’ से आदेश आते हैं कि फलां जगह पर जाकर बलवा करना है. इससे समझ आता है कि क्यों घाटी में सिचुएशन हाथ से निकलते देख प्रशासन इंटरनेट बंद कर देता है.


बुरहान वानी 8 जुलाई को मारा गया. इसके बाद पूरी घाटी में ज़ोरदार प्रदर्शन हुए थे और चार महीनों में 19000 लोग ज़ख्मी हुए थे. पत्थरबाज़ी और पुलिस की कार्रवाई में 92 लोगों की मौत हो गई थी. सुरक्षा एजेंसियों के 4000 जवान भी ज़ख्मी हुए थे.

हिंसा की साइकिल में पहिए इन्हीं पत्थरों के हैं

घाटी में हो रहे प्रदर्शन और उनमें लोगों का मारा जाना एक गंभीर मुद्दा है. कई बार माहौल इतना खराब हो जाता है कि पुलिस को गोली चलानी पड़ती है. लेकिन इसमें कई लोगों की जान चली जाती है. एक बीच का रास्ता निकाला गया पैलेट गन के रूप में. लेकिन उनके इस्तेमाल से कई लोगों की आंखों की रोशनी चली गई. जिसके बाद इनका इस्तेमाल भी विवादों में है. इस सब ने सुरक्षा एजेंसियों को सोच में डाल दिया कि प्रदर्शनों से कैसे निपटें. क्योंकि गोली का जवाब गोली होता है, लेकिन पत्थर का जवाब कुछ नहीं है. पत्थर से निपटने के लिए कोई स्टैंडर्ड ऑपरेटिंग प्रोसीजर नहीं (SOP) है.

”एक बार हमने एक पुल पर खड़ी गाड़ी पर पेट्रोल बॉम्ब फेंका था. इसमें दो लोग ज़िंदा जल गए थे.”

– ज़ाकिर अहमद भट (2014 में किए एक हमले के बारे में बताते हुए. जिंदा जलने वाले पुलिस वाले थे)

27 मार्च को भी यही हुआ था. बडगाम में फौज और पुलिस ने एक उग्रवादी को घेरा तो उन पर पत्थरबाज़ी होने लगी. महौल बिगड़ने पर भीड़ पर गोली चलानी पड़ी जिसके नतीजे में तीन नौजवानों की जान चली गई. इसके बाद पूरी घाटी में बंद बुला लिया गया. माहौल में तनाव हो गया. ऐसे  हालातों में ही हिंसा भड़क जाती है. तो पत्थरबाज़ एक तरह से माहौल को सामान्य होने से रोके रहते हैं.

अब जब ये शुबहा दूर हो गया है कि पत्थरबाज़ी स्पॉन्सर्ड है, एजेंसियां इनसे निपटने के लिए पॉलिसी के स्तर पर कदम उठा पाएंगी. इसका एक फायदा ये भी है कि घाटी में प्रदर्शन और उनपर फौज/पुलिस की कार्रवाई को लेकर जो ‘दमन’ का नैरेटिव गढ़ा गया है, उसे अब नई रोशनी में देखा जा सकेगा

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